Sunday, May 4, 2014

"अपनी सीमा में रहो"

तुम्हारी हर बात
आत्मा को छल्ली करने वाली है
तुम्हारा अत्याचार
मेरी ख्वाइशों का क़त्ल करता है
और निशां छोड़ता जा रहा है
जहन में हीनता का , घृणा का
फिलहाल
मैं इसे सब्र के
गोदाम में रख रही हूँ
परन्तु
ये तो मुझे भी नहीं मालूम
कि जब ये गोदाम भरेगा
तो क्या होगा ??

तुम अपनी कटुता
हर दिन बढ़ाते ही जा रहे हो
हिंसा ढ़ाते ही जा रहे हो
परन्तु जब ये पीड़ा
असहनीय हो जायेगी
तब क्या होगा ?
ये मैं भी नहीं जानती..

हाँ! परन्तु तुम्हे
चेतावनी अवश्य देना चाहती हूँ
अपनी सीमा में रहो
मेरे सीने पर
अपनी ज्यातिति का महल
मत बनाते जाओ
मेरे ज़स्बातो कि
भुरभुराती रेत को खनते मत जाओ
इतना दाब मत बढ़ाओ
वरना यदि ये समंदर अपना फ़न उठाएगा
तो तू इस सुनामी से बच नहीं पायेगा

मुझे नहीं पता
कहना भी मुश्किल है
कि तब तुम्हारा क्या हश्र होगा?
इसलिए कहे देती हूँ पहले ही
अपनी हदें पार मत करो

अपनी सीमा में रहो !!!

रचनाकार: परी ऍम 'श्लोक'

(Note : घरेलु हिंसा कि खिलाफत करती हुई मेरी यह रचना )

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